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9 अगस्त 1925: जानिये काकोरी काण्ड की दर्दभरी कहानी

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अंग्रेजों ने भारत पर कई सालों तक राज किया| अंग्रेजों को अपने देश से भगाने के लिए कई लोगों की जान गई| ये आज़ादी कितने ही लोगों के बलिदान के बाद मिली है| राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जब ‘असहयोग आंदोलन’ वापस लिया था तो इससे कई लोगों को काफी झटका लगा| इसके बाद एक नई घटना की नींव पड़ गई थी, जिसे इतिहास में काकोरी कांड के नाम से जाना जाता है|

रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह समेत कुल दस क्रांतिकारियों को काकोरी कांड के लिए हमेशा याद किया जाता है|

इस पूरे कांड के दौरान जर्मनी के माउज़र का इस्तेमाल किया गया, करीब चार हजार रुपये लूटे गए थे| ये घटना 9 अगस्त 1925 को हुई थी, जिसे क्रांतिकारी भगत सिंह ने विस्तार से लिखा था| पंजाबी पत्रिका ‘किरती’ में जो उस समय की एक बहुत प्रसिद्ध पत्रिका थी| इसी में भगत सिंह ने एक सीरीज़ शुरू की थी| वे इसमें इस घटना से जुडी सारी बातें करते थे|

मई, 1927 को ‘काकोरी के वीरों से परिचय’ नाम के लेख में उन्होंने बहुत कुछ लिखा| उन्होंने लिखा था 9 अगस्त, 1925 को काकोरी स्टेशन से एक ट्रेन चली| ये करीब लखनऊ से 8 मील की दूरी पर था| ट्रेन चलने के कुछ ही देर बाद उसमें बैठे 3 नौजवानों ने गाड़ी रोक दी| उनके ही अन्य साथियों ने गाड़ी में मौजूद सरकारी खजाने को लूट लिया| उन तीन नौजवानों ने बड़ी चतुराई से ट्रेन में बैठे अन्य यात्रियों को धमका दिया था और समझाया था कि उन्हें कुछ नहीं होगा बस चुप रहें| लेकिन दोनों ओर से गोलियां चल रही थीं और इसी बीच एक यात्री ट्रेन से उतर गया और उसकी गोली लगकर मौत हो गई|

उन्होंने आगे लिखा कि इसके बाद अंग्रेजों ने इस घटना की जांच बैठा दी| सीआईडी के अफसर हार्टन को जांच में लगा दिया गया| उसे मालूम था कि ये सब क्रांतिकारी जत्थे का किया धरा है, कुछ वक्त बाद ही क्रांतिकारियों की मेरठ में होने वाली एक बैठक का अफसर को पता लग गया और छानबीन शुरू हो गई| सितंबर आते-आते गिरफ्तारियां होनी शुरू हो गईं, राजेंद्र लाहिड़ी को बम कांड में दस साल की सज़ा हुई, अशफाक उल्ला, शचींद्र बख्शी भी बाद में पकड़े गए|

काकोरी कांड का मकसद सिर्फ अंग्रेजों के सरकारी खजाने को लूटना था और  एक कड़ा संदेश पहुंचाना था| इसके बाद जब अधिकतर लोग पकड़े गए तो दस महीने तक मुकदमा अदालत में चला और फांसी तक की नौबत आ गई|

जनवरी, 1928 में भगत सिंह ने फिर से एक लेख लिखा| लेख में लिखा कि 17 दिसंबर, 1927 को राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को गोंडा में, 19 दिसंबर को रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर, अशफाक उल्ला खां को फैज़ाबाद, रोशन सिंह को इलाहाबाद की जेल में फांसी दे दी गई| सुनवाई कर रहे सेशन जज हेमिल्टन ने कहा था कि ये सभी नौजवान देशभक्त हैं, भले ही इन्होंने अपने फायदे के लिए कुछ ना किया हो लेकिन अगर ये जवान कहें कि वो अपने किए का पश्चाताप करेंगे तो सज़ा में कुछ रियायत दी जा सकती है, लेकिन अंग्रेज़ी हुकूमत के आदेश पर फांसी दे दी गई|

भगत सिंह ने ये भी बताया कि जब हर किसी को फांसी दिए जाने का वक्त हुआ, तो इन्हीं में से जब अशफाक उल्ला खां को फांसी दी जा रही थी तब उन्होंने जाते हुए कुछ शेर पढ़े थे|

अशफाक फांसी से एक दिन पहले अपने बाल सही कर रहे थे, तब उन्होंने साथी से कहा कल मेरी शादी है और कैसी बातें कर रहे हैं| फांसी की ओर जाने से पहले अशफाक उल्ला खां ने शेर पढ़ा, ‘फ़नाह हैं हम सबके लिए, हम पै कुछ नहीं मौक़ूफ़… वक़ा है एक फ़कत जाने की ब्रिया के लिए’. इसके अलावा उन्होंने कहा…‘तंग आकर हम उनके ज़ुल्म से बेदाद से, चल दिए सूए अदम ज़िन्दाने फ़ैज़ाबाद से’|

जब रामप्रसाद बिस्मिल को 19 की शाम को फांसी दी गई, तब वो बड़े ज़ोर से वंदे मातरम और भारत माता की जय के नारे लगाने लगे| इसके साथ ही उन्होंने भी कहा था कि

‘मालिक तेरी रज़ा रहे और तू ही तू रहे

बाक़ी न मैं रहूं, न मेरी आरज़ू रहे

जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे

तेरी ही जिक़्रेयार, तेरी जुस्तजू रहे’

जब राम प्रसाद बिस्मिल फांसी के तख्ते पर पहुंचे तब उन्होंने कहा,

‘अब न अहले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़, एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है’